ज्वालाज़ी की कहानी, मेरी ज़ुबानी

ज्वालाज़ी की कहानी, मेरी ज़ुबानी

हिमाचल प्रदेश को देवी-देवताओं की भूमि यानि देवभूमि कहा जाता है, कारण मंदिरों क़ा अधिक होना,यानि जितने मंदिर उतनी कहानियां ! 

ख़ैर ! आज़ मैं हूँ अपनी कुलदेवी यानि माँ ज्वाला के दरबार में, कुलदेवी इसीलिए क्योंकि बहुत समय पहले हमारे पूर्वज यहीं से ही कुल्लू (आनी)आए थे और हमेशा के लिए वहीं बस गए, अतः कुलदेवी है तो परम्परानुसार माँ के दर्शन के लिए हर साल यहाँ आना ही पड़ता है !

ज्वालाज़ी की विशेषता :-

हिमाचल प्रदेश में मंदिरों की कमी नहीं, हर मंदिर की अपनी-अपनी बिशेषता, ऎसी ही एक अलग और अनूठी विशेषता इस मंदिर की भी है और वो है इस मंदिर में मूर्ति क़ा ना होना, जो हिमाचल के सभी मंदिरों को इस मंदिर से अलग करती है ! जितने भी भक्त पहली बार ज्वालाजी आते हैं वो आश्चर्यचकित ज़रूर होते हैं, वो इसलिए क्योंकि बिना घी,तेल के हजारों सालों से यहाँ ज्वाला दहकती रहती है, ना ताप ना आग ना धुंआ, फ़िर भी गोरखडिब्बी में पानी उबलता रहता है, आख़िर यह श्रद्धा है,चमत्कार है, या कोई वैज्ञानिक तथ्य ……………….बहुत सारे प्रश्नों से मन उचाट रहता है यहाँ ? तो आईए जाने कुछ रहस्यमयी बातें मेरे साथ मेरे इस ज्वालाजी सफ़र में……………………………………

Vinay near Jwalaji

ज्वालाज़ी क़ा पौराणिक इतिहास :-

ज्वालाज़ी क़ा मंदिर 51शक्तिपीठों में से एक है, जो हिमाचल के बेहद ख़ूबसूरत जिला कांगड़ा के कालीधार पहाड़ी पर बसा है ! शक्तिपीठ वे स्थान हैं जहाँ माँ सती के शरीर के 51भाग गिरे थे ! 
मान्यता है कि यहाँ माँ सती की ”जिह्वा” गिरी थी, मुख क़ा प्रमुख हिस्सा होने के कारण ही इस जगह का नाम ”ज्वालामुखी ” पड़ा, यानि ऎसा मुख जिससे ज्वाला निकले ! 

अगर हम ” शिव महापुराण” को थोड़ा खंगालते हैं तो हम पाते हैं कि जब भगवान शिव के साथ माता सती क़ा विवाह हुआ था तो माता सती के पिता राज़ा दक्ष इस विवाह से सहमत नहीं थे, और विवाह उपरांत उन्होनें एक यज्ञ करवाया था, जिसमें अपने ही जमाता भगवान शिव को नहीं बुलाया, अपने पति के इस निरादर को माता ” सती” सहन नहीं कर पायी और उन्होनें उसी हवन कुंड में अपनी जान की आहुति दे दी, भगवान शिव माता सती के जले और क्षत-विक्षत शव को लेकर जब ब्रह्मांड में दुःखी मुद्रा में विचरण कर रहे थे तो उसी समय सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, कि वे भगवान शिव को पत्नी मोह से उभारे, और देवताओं के कहने पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शनचक्र से माँ सती के शव के 51 भाग किए और शरीर यही भाग *51 शक्तिपीठ* कहलाए ! 

मौजूदा सभ्यताओं की कहानी जहाँ से शुरू होती है ज्वालाज़ी की कहानी शायद उससे भी पुरानी है, जो हजारों सालों से सुनाई जाती है ! 

कहते हैं कि इस जगह पर (ज्वालाज़ी में ) कभी दैत्यों और देवताओं में भीषण युद्ध हुआ था जो सैंकडो साल चला, अंत में देवता हार गए और उसी हार के प्रतिशोध के लिए देवताओं ने अपनी ऊर्जा एक साथ एकत्रित की तो ज्योतिपुंज से माँ आदिशक्ति क़ा जन्म हुआ और उन्ही की अवतार ”सती” नें भगवान शिव से विवाह किया था !

इतिहास की नज़र में ज्वालाज़ी :-

वैसे देखा जाए तो आस्था को कल्पना क़ा नाम नहीं दिया जा सकता, क्योंकि आस्था क़ा प्रमाण नहीं हो सकता, या यूँ कहें कि आस्था को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, लेकिन फ़िर भी मेरे मन में एक प्रश्न हिलोरे ले रहा था कि *आखि़र यह ज्वाला प्रज्ज्वलित कैसे हो रही है ?* 
शायद यही प्रश्न बादशाह अकबर के मन को भी बैचेन कर गया होगा जो दिल्ली से नंगे पैर यहाँ आने को मज़बूर हो गए होंगें ! 

कहते हैं कि माँ ज्वाला के दर्शन के लिए आ रहा एक भक्त ‘ ”ध्यानू” को अकबर ने बंदी बना लिया और उससे पुछा कि कहाँ जा रहे हों ? 

तो भक्त ध्यानू ने माता की पूरी कहानी सुना दी, मगर अकबर ने ने विश्वास करने से मना कर दिया और ध्यानू भक्त के सामने एक घोड़े क़ा सिर काट कर कहा कि *अगर तुम्हारी ज्वालामाता इस सिर को फ़िर से धड़ से जोड़ दे तो में समझूंगा कि सच में वहाँ पर (ज्वालाज़ी में )चमत्कार होता है*

ध्यानूभक्त के प्रार्थना करने पर जब माँ ज्वाला प्रकट नहीं हुई तो उसने अपना सिर काट दिया, अपने भक्त को माँ ने निराश नहीं किया और चमत्कारस्वरूप भक्त और घोड़े दोनों क़ा सिर अपने आप धड़ से जुड़ गया ! 

अकबर इस घटना से आश्चर्यचकित हो गया, ज्वालामुखी पहुंचा तो धधकती ज्वाला को देखकर उसे बुझाने की ठान ली और मंदिर के पीछे पहाड़ी से बहती नदी से एक नहर बनाकर जल रही ज्वाला पर ड़ाल दी, आग फ़िर भी नहीं बुझी तो हताश मन अकबर की वापिसी हुई, कुछ समय बाद जब दिल्ली में संक्रमित बीमारी फ़ैली तो प्रजाहितार्थ, इस बिमारी से निजात पाने हेतू तथा माँ ज्वाला के दर्शनों के लिए नंगे पाँव दिल्ली से यहाँ पहुंचा और भेंटस्वरूप *सोने क़ा छत्र * दान किया, किंतु मन में फ़िर घमंड आ गया कि मैं पहला मुगल बादशाह हूँ जिसने सोने छत्तर चढ़ाया है, बादशाह के इतना सोचते ही छत्र ज़मीन पर गिर गया और सोने से किसी दूसरी धातु में तबदील हो गया, अब यह छत्र किस धातु क़ा है आज़ भी पहेली बना है ! 

Gorakh Dibbi
गोरख डिब्बी और इसके पीछे अकबर द्वारा ज्वाला बुझाने के लिए बनाई नहर ..

आज़ के समय में भू-गर्भ वैज्ञानिकों की माने तो यहाँ प्राकृतिक गैसों के भंडार है, जिससे चट्टानों के बीच से गैस निकलती है, जिसे चमत्कार क़ा नाम दिया गया है, ख़ैर ! विज्ञान और चमत्कार एक ही सिक्के के दो अलग-अलग पहलू है, सच चाहे कुछ भी हो यहाँ इस मंदिर से हम सभी की आस्था जुड़ी है, लेकिन एक बात ज़रूर है कि यहाँ से वापसी मन में बहुत सारे प्रश्नों के साथ ही होती है, बहुत से प्रश्नों के उत्तर तो मिल जाते हैं लेकिन बहुत से मन में ही दफ़न हो जाते हैं !